प्रयागराज महाकुंभ
इस समय प्राचीन नगरी प्रयागराज में महाकुंभ मेले का आयोजन किया जा रहा है। देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु इसका हिस्सा बनने आ रहे हैं। कुंभ एक प्राचीन सनातनी परंपरा का प्रतीक है जिसके मूल में आध्यात्मिकता है। श्रद्धालु हर छह साल में आयोजित होने वाले कुंभ और हर 12 साल में आयोजित होने वाले पूर्ण कुंभ का इंतजार करते हैं। लेकिन संन्यास की राह पर चल पड़े नागा साधु भी इसी का इंतजार करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि कुंभ के मौके पर उन्हें नागा साधु की उपाधि मिलती है।
इस साल भी अलग-अलग अखाड़ों के करीब 8000 साधुओं को नागा पदवी दी जाएगी। नागा साधु अपने अनोखे पहनावे और व्यवहार के कारण आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इनके बारे में चर्चा करने से पहले अखाड़ों के बारे में जानना जरूरी है।
आदि गुरु शंकराचार्य का योगदान
यदि हम इतिहास में भारत की सनातन परंपरा का उद्गम खोजने का प्रयास करें तो हमें बहुत पीछे जाना पड़ेगा। समय-समय पर ऐसे विचारक और दार्शनिक पैदा हुए जिन्होंने इसमें आवश्यक सुधार किए और इसे समकालीन प्रासंगिकता प्रदान की। ऐसे ही एक व्यक्ति थे पांचवीं शताब्दी में जन्मे आदि गुरु शंकराचार्य। जिस समय उनका जन्म हुआ, उस समय भारत का आज जैसा कोई स्पष्ट भौगोलिक स्वरूप नहीं था। हां, वह समय बाहरी आक्रमणकारियों के हमलों से भरा हुआ था।
13 अखाड़े हैं सनातन की रीढ़
सनातन की परंपरा को मजबूत बनाए रखने के लिए शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों में ज्योतिर्मठों की स्थापना का संकल्प लिया और 32 वर्ष के अपने छोटे से जीवनकाल में इसे पूरा भी किया। शंकराचार्य यह भी जानते थे कि केवल शास्त्रों से सनातन की रक्षा नहीं हो पाएगी, इसलिए इसके लिए उन्होंने सनातन के संगठित स्वरूप पर भी जोर दिया और समय के साथ 13 अखाड़े अस्तित्व में आए।
ये 13 अखाड़े हैं
श्री पंच दशनाम जूना (भैरव) अखाड़ा, श्री पंच दशनाम आह्वान अखाड़ा, श्री शंभू पंच अग्नि अखाड़ा, श्री शंभू पंचायती अटल अखाड़ा, श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा, पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी, श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा, श्री पंच दिगंबर अनी अखाड़ा, श्री पंच निर्वाणी अनी अखाड़ा, तपोनिधि श्री आनंद अखाड़ा, श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासी, श्री पंचायती अखाड़ा निर्मल, श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासी।
नागा साधु बनने की प्रक्रिया है लंबी
अब बात करते हैं कि नागा साधु कैसे बनते हैं। नागा साधु बनने की प्रक्रिया कठिन और लंबी है। नागा साधुओं के संप्रदाय में शामिल होने की प्रक्रिया में करीब छह साल लगते हैं। इस दौरान नए सदस्य लंगोटी के अलावा कुछ नहीं पहनते। कुंभ मेले में अंतिम प्रतिज्ञा लेने के बाद वे लंगोटी भी त्याग देते हैं और जीवन भर दिगंबर रहते हैं।
पहले ब्रह्मचारी, महापुरुष और अवधूत
इस संबंध में महाकुंभ मेले में आए रामायण के जानकार और लंबे समय से संन्यासी जीवन जी रहे राजो चौहान का कहना है कि कोई भी अखाड़ा पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही योग्य व्यक्ति को प्रवेश देता है। पहले उसे लंबे समय तक ब्रह्मचारी के रूप में रहना होता है, फिर उसे महापुरुष और फिर अवधूत बनाया जाता है। अंतिम प्रक्रिया महाकुंभ के दौरान होती है, जिसमें उसका खुद का पिंडदान और दंडी संस्कार आदि शामिल होता है।
मौनी अमावस्या का विशेष महत्व
मौनी अमावस्या से पहले ही संन्यासी को नागा साधु बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। परंपरा के अनुसार पहले दिन आधी रात को विशेष पूजा की जाएगी, जिसमें दीक्षा लेने वाले संन्यासी को उसके संबंधित गुरु के सामने नागा बनाया जाएगा। संन्यासी आधी रात को गंगा में 108 डुबकी लगाएगा। इस स्नान के बाद उसकी आधी शिखा (चोटी) काट दी जाएगी।
गुरू करते हैं नागा को स्वीकार
इसके बाद उन्हें तपस्या के लिए जंगल में भेज दिया जाएगा। आसपास जंगल न होने की स्थिति में संन्यासी अपना डेरा छोड़कर चले जाएंगे। समझा-बुझाकर उन्हें वापस बुलाया जाएगा। तीसरे दिन वे नागा बनकर वापस आएंगे और उन्हें अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर के समक्ष लाया जाएगा। नए नागा अपने हाथों की अंजलि बनाकर गुरुओं को जल अर्पित करेंगे। अगर गुरु जल स्वीकार कर लेते हैं तो माना जाता है कि उन्हें नागा स्वीकार कर लिया गया है। मौनी अमावस्या को सुबह 4 बजे स्नान से पहले गुरु नए नागा संन्यासियों की शिखा काटेंगे। मौनी अमावस्या पर जब अखाड़ा स्नान के लिए जाएगा तो उन्हें भी अन्य नागाओं के साथ स्नान के लिए भेजा जाएगा। इस तरह से संन्यासी को नागाओं के रूप में स्वीकार कर लिया जाएगा।
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