बांग्लादेश
दुर्गा पूजा का उत्साह केवल भारत में ही नहीं, बल्कि हमारे पड़ोसी बांग्लादेश में भी माँ दुर्गा की पूजा बड़े आयोजन के रूप में होती है। सिर्फ हिंदू समुदाय ही यह त्योहार नहीं मनाते, बल्कि लिबरल मुसलमान भी इसमें बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। वहां यह अब एक सार्वभौमिक त्योहार है। यह जानना काम सुखद नहीं है कि 2022 में बांग्लादेश में 32,168 दुर्गा पंडाल लगाए गए थे। अकेले ढाका में पूजा पंडालों की संख्या 241 थी। बांग्लादेश में हिन्दुओं की आबादी लगभग 8 प्रतिशत है, लेकिन बहुसंख्यक मुस्लिम भी इस अवसर पर पंडालों में इकट्ठा होते हैं और ढाक (एक विशेष ताल वाद्य) की आवाज़ पर डांस भी करते हैं। ढाका के अलावा फरीदपुर, नेत्रकोना और खुलना में त्योहार जोरदार ढंग से मनाया जाता है। वहां भी भैंस राक्षस महिषासुर के वध के बाद देवी दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन होता है। माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाने वाले महीना भर पहले से ही तैयारी कर लेते हैं। पंडाल के आयोजक दूर दूर से कारीगरों को बुलाते हैं। मूर्तिकार एक पंडाल सजाने के लिए 50 हज़ार टका चार्ज करते हैं।
बांग्लादेश में दुर्गा पूजा का इतिहास
सच कहे तो आज जिस रूप में हम दुर्गा पूजा का आयोजन करते हैं, उसकी शुरुआत बंगाल से हुई। आज भी धूमधाम और भव्यता में कोलकाता की दुर्गापूजा का कोई मुकाबला नहीं है। भारत विभाजन से पहले बांग्लादेश भी बंगाल का ही हिस्सा था, इसलिए संस्कृति भी एक ही थी। पहले पूर्वी बंगाल के रूप में पाकिस्तान का हिस्सा बना और फिर 1971 में स्वतंत्र देश। कहा जाता है कि 12वीं शताब्दी में संध्याकर नंदी द्वारा लिखित रामचरित में उमा (दुर्गा का दूसरा नाम) की पूजा एक उत्सव के रूप में मनाने का उल्लेख किया गया है। उसमें यह लिखा है कि इस त्यौहार का आयोजन शरद ऋतु में, कभी-कभी हेमन्त (देर से शरद ऋतु) में किया जाता है। मार्कण्डेय पुराण में भी इस बात का उल्लेख है कि माँ दुर्गा की वार्षिक पूजा शरद ऋतु में होती है। इसके अलावा 16वीं शताब्दी में मुकुंदरम द्वारा लिखित कबिकांकन चंडी में दुर्गा की महिषासुरमर्दिनी की आकृति का वर्णन किया गया है।
ऐतिहासिक साक्ष्य
बांग्लादेश की राजधानी ढाका में स्थित ढाकेश्वरी मंदिर इस बात का प्रमाण है कि इस क्षेत्र में माँ दुर्गा की उपासना सदियों से होती चली आ रही है। माना जाता है कि ढाकेश्वरी मंदिर की स्थापना 12वीं शताब्दी में बल्लाल सेन नाम के एक हिंदू राजा ने की थी। बल्लाल सेन को माँ दुर्गा ने सपने में आकर कहा था कि उनकी प्रतिमा पास के जंगल के एक विशेष स्थान पर दबी हुई है, वह उस प्रतिमा को वहां से लेकर मंदिर में स्थापित करें। ढाकेश्वरी माँ के नाम पर ही बांग्लादेश की राजधानी का नाम ढाका पड़ा, ऐसी मान्यता है। तभी से ढाका में माँ दुर्गा की यह पारंपरिक पूजा होती आ रही है। बांग्लादेश में ढाकेश्वरी मंदिर के अलावा सिद्धेश्वरी मंदिर, रमना काली मंदिर और रामकृष्ण मिशन मंदिर भी दुर्गा और काली पूजा के लिए विश्वविख्यात है। सिलहट जिले के पंचगांव की दुर्गापूजा लगभग 300 साल पुरानी है। यह पूरे उपमहाद्वीप में एकमात्र लाल रंग की दुर्गा है।
पूजा का आयोजन बड़े जमींदारों की पहचान बन गई
आधुनिक कल में ढाका में सबसे बड़ी दुर्गापूजा का आयोजन 1830 में होने का प्रमाण मिलता है। पुराने ढाका के सूत्रपुर इलाके में मैसुंडी के व्यवसायी नंदलाल बाबू के घर आयोजन किया गया था। इसके साथ ही 1857 में सिपाही विद्रोह के दौरान बिक्रमपुर परगना के भाग्यकुल के जमींदारों के राजा ब्रदर्स एस्टेट और मानिकगंज जिले के सतुरिया के बलिहादी में जमींदार के घर पर भी दुर्गापूजा का आयोजन किया गया था। बाद में बंगाल में दुर्गा पूजा का आयोजन और उसकी भव्यता बड़े जमींदारों की पहचान बन गई। अमीर और बड़े व्यापारी भी अपनी सामाजिक हैसियत दिखाने के लिए बड़े-बड़े दुर्गा पंडाल लगाने लगे। हालांकि 1947 में भारत के विभाजन के बाद कई काफी संख्या में हिंदू भारत आ गए, लेकिन बांग्लादेश में सामूहिक दुर्गा पूजा का आयोजन जारी रहा।
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