कनाडा में भी PoK चला रहा आजादी का जबरदस्त आंदोलन

नई दिल्ली
खालिस्तान आंदोलन और खालिस्तानी आतंकियों का लंबे समय से कनाडा समर्थन करता रहा है। ये खालिस्तानी भारत के पंजाब समेत कुछ और राज्यों को मिलाकर एक अलग देश खालिस्तान की मांग कर रहे हैं। हालांकि, ये आंदोलन 1980 के दशक में खत्म हो चुका है लेकिन अब नए सिरे से कुछ सालों में कनाडा में बसे खालिस्तान समर्थकों ने उसे हवा देने की कोशिश की है।  खालिस्तानी कनाडा में अपनी मांग के समर्थन में जनमत संग्रह भी करवाते रहे हैं। ठीक इसी तरह का एक जबरदस्त आंदोलन का सामना कनाडा खुद कर रहा है।

क्या है क्यूबेक आंदोलन
कनाडा 10 प्रांतों और तीन टेरिटरी को मिलाकर बना है। कनाडा का सबसे बड़ा प्रांत क्यूबेक है। इसी क्यूबेक में लंबे समय से आजादी की मांग की जा रही है और वहां तेज आंदोलन चल रहा है। वैसे तो क्यूबेक 1867 से ही कनाडा का एक प्रांत रहा है लेकिन आर्थिक, सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के आधार पर वह एक अलग संप्रभु देश की मांग करता रहा है। इसे कनाडा का PoK कहा जाता है। जहां पाकिस्तान से आजाद होने के लिए चल रहे आंदोलन की ही तरह कनाडा से आजादी के लिए उग्र विरोध-प्रदर्शन चल रहा है।
कनाडा के हाउस ऑफ कॉमन्स में क्यूबेक 78 सांसद चुनकर भेजता है, जो किसी राज्य के मामले में दूसरा नंबर है। कनाडा की सत्तारूढ़ लिबरल पार्टी के पास इस प्रांत से 35 सांसद हैं, ब्लॉक क्यूबेकॉइस- क्यूबेक की संप्रभुता के लिए लड़ने वाला एक राजनीतिक दल है, जिसके इस प्रांत से 32 निर्वाचित सांसद हैं।

भारत ने रख दी दुखती रग पर हाथ
कनाडा से क्यूबेक के अलग होने के लिए यहां दो बार जनमत संग्रह हो चुका है। पहला जनमत संग्रह 1980 के दौरान हुआ। इसमें कनाडा के 10 प्रातों में से केवल चार प्रांत ही क्यूबेक के समर्थन में आए। बाकी छह प्रांतो ने क्यूबेक को बड़ा झटका देते हुए उसके सपनों पर पानी फेर दिया। दूसरा जनमत संग्रह 1995 में हुआ, जिसमें कनाडा दो फाड़ होते-होते बच गया। क्यूबेक की आजादी के समर्थन में कुल 49.4 फीसदी लोगों ने वोट किए, जबकि इसके विरोध में 50.6 फीसदी लोगों ने वोट किए। मात्र 54000 वोटों की वदह से क्यूबेक को आजादी नहीं मिल सकी। दो बार जनमत संग्रह के बावजूद कनाडा ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है लेकिन भारत ने अब उसकी इस दुखती रग पर हाथ रख दिया है। खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद उपजे विवाद और तल्ख रिश्तों के बीच भारत में अब क्यूबेक को समर्थन देने और उस आंदोलन के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल करने देने की मांग होने लगी है। केंद्र की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बैजयंत पांडा ने पिछले दिनों कहा कि जब कनाडा ने खालिस्तान समर्थकों के विचार को बढ़ाने के लिए अपनी धरती का इस्तेमाल करने की इजाजत दी है तो हमें भी क्यूबेक की आजादी के आंदोलन को सुविधाजनक बनाने के लिए अपनी धरती की पेशकश करनी चाहिए।

ट्रूडो को छूट रहे पसीने
बीजेपी नेता की इस मांग से कनाडाई प्रधानमंत्री को सांप सूंघ गया है। जस्टिन ट्रूडो के पसीने छूट रहे हैं क्योंकि कनाडा को पता है कि अगर भारत ने क्यूबेक की आजादी का समर्थन कर दिया तो उसे लेने के देने पड़ सकते हैं। जिस वक्त ये दोनों देश आपसी रिश्तों में तल्खी, बेरुखेपन और तनानतनी का सामना कर रहे हैं, ठीक उसी वक्त क्यूबेक में आजादी के आंदोलनकारियों ने अपना आंदोलन और उग्र कर दिया है। जस्टिन ट्रूडो बीजेपी नेता के बयान से बेचैन हो उठे हैं।

आजादी की मांग क्यों?
दरअसल, कनाडा 150 सालों तक फ्रांस का उपनिवेश रहा है। 1760 में ब्रिटेन ने कनाडा पर हमला किया। इसके बाद कनाडा दो हिस्सों में बंट गया। एक ऊपरी कनाडा और दूसरा निचला कनाडा। अपर कनाडा पर ब्रिटेन ने कब्जा कर लिया, जबकि लोअर कनाडा पर फ्रांस का कब्जा बरकरार रहा। यही लोअर कनाडा आज क्यूबेक के नाम से जाना जाता है। ब्रिटेन ने 1867 में कनाडा को सत्ता सौंप दी। 1867 के संविधान अधिनियम के तहत 1 जुलाई, 1867 को कनाडा के चार प्रांतों ओंटारियो, क्यूबेक, नोवा स्कोटिया, और नई ब्रंसविक की आधिकारिक तौर पर घोषणा की गई लेकिन कनाडा को पूरी तरह से स्वतंत्रता  17 अप्रैल 1982 को मिली। इस तरह क्यूबेक पर लंबे समय तक फ्रांसीसी प्रभुत्व रहा। वहां की 90 फीसदी आबादी फ्रेंच बोलती है और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से अपने को फ्रेंच समझती है। यही वजह है कि वह अलग संप्रभु देश के रूप में अपनी पहचान चाहते हैं।  क्यूबेक के लोगों का ये भी आरोप है कि ट्रूडो की सरकार क्यूबेक के साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाती है। आरोप है कि ट्रूडो सरकार क्यूबेक के लोगों को न तो अच्छी सैलरी देते हैं और न ही अन्य सुविधाएं, जो अन्य कनाडाई नागरिकों को मिलते हैं। ये ठीक वैसी ही स्थिति है, जैसी पाक अधिकृत कश्मीर में है।


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